मोदी सरकार का धन्वंतरि अवतार

निजी मेडिकल कोलेजों में आधी सीटों की फीस सरकारी मेडिकल कॉलेजों के बराबर करना एक शुभ और अच्छी खबर है जबकि प्राइवेट कॉलेजों में फीस करोड़ों में पहुँच जाती है। बड़ी संख्या में छात्रों को चीन, रूस, उक्रेन यहाँ तक कि बांग्लादेश भी चले जाते है क्यूंकि वहां पढ़ना यहाँ की अपेक्षा सस्ता पड़ता है। आज से करीब 17-18 साल पहले जब अटल जी की सरकार गई ही थी और केंद्र में कांग्रेस का बोल वाला था तब एनसीआर में कॉल सेंटर की जॉब बहुत अट्रैक्टिव मानी जाती थी। इसमें डिग्री की कोई बंदिश नहीं स्कुल, कॉलेज में पढ़ रहे कोई समस्या नहीं क्यूंकि नाइट शिफ्ट है बस विदेशी लहजे में अंग्रेजी अच्छी बोलनी आनी चाहिये और उस समय के हिसाब से सैलरी भी अच्छी मिलती थी लगभग 22-35 हजार रूपये। उसी दौरान एक इंटरव्यू के पहले राउंड में एक लड़के से मुलाक़ात हुई। इंटरव्यू लेने वाले ने उसी से पहला सवाल किया, आपकी क्वालिफिकेशन क्या है? कॉन्फिडेंस से भरा उत्तर मिला MBBS। मैं क्या कमरे में मौजूद और खुद इंटरव्यू ले रहा शख्स भी हैरान हो गया। इससे पहले हम ज्यादा सोच पाते उससे दूसरा सवाल पूछा गया, तो कॉल सेंटर में क्यों आना चाहते हो? डॉक्टर हो इससे बहुत ज्यादा कमा सकते हो। उत्तर आया प्रैक्टिस नहीं कर सकता। ये और भी हैरानी की बात थी क्योंकि जबाब दे रहा शख्स बेहद आत्मविश्वास से भरा और स्मार्ट दिख रहा था। अगला सवाल फिर पूछा गया, क्यों नहीं कर सकते क्या डिग्री में कोई प्रॉब्लम? सामने से जबाब आया जी नहीं, मेरे पास डिग्री है लेकिन जो फॉरेन से मेडिकल की डिग्री लेकर आते है उन्हें यहाँ प्रैक्टिस करने के लिए भारत सरकार का एक और एग्जाम पास करना पड़ता है और काफ़ी कठिन है, इस बार मैं क्लियर नहीं कर पाया आगे और अटेम्प करूँगा पर तब तक के लिए कुछ काम करना चाहता हूं ताकि बैंक से लिए एजुकेशन लोन की किश्त भरने में अभी पेरेंट्स को कुछ मदद मिले। जाहिर सी बात है वह उम्मीदों से भरे मिडिल क्लास माता पिता की संतान था। उस दिन की घटना ने मन मस्तिष्क पर काफी प्रभाव डाला लेकिन मैं कुछ दिन या महीनों में इसे भूल जाता यदि ऐसे ही एक लड़के से मुलाक़ात न हुई होती तो। काफ़ी दिनों से एक लड़के को अपने ऑफिस में देखता आया था, हाय हैलो होती रहती थी ज़ब पता चल कि वो भी मेरे गृह जनपद के पास के जनपद का ही रहने वाला है। जाहिर है हम थोड़ा और करीब हो गए फिर किसी दिन इधर उधर की बातें करते हुए पूछा इधर कैसे आना हुआ तो उसने बताया, मैं उक्रेन में MBBS की पढ़ाई कर रहा था, लाइफ अच्छी जा रही थी कि एक दिन स्थानीय लड़कों से मार पीट थोड़ी "ज्यादा" हो गई और एक तरह से डिपोर्ट कर दिया गया। वापस जाने में खतरा है और मां बाप भी वापस भेजना नहीं चाहते क्यूंकि मैं उनका अकेला लड़का हूँ। इन दो मुलाकातों के बाद भी कांग्रेस का शासन लम्बा चला लगभग दस साल। मै सोचता रहा कि सरकार आखिर यहाँ पढ़ने की व्यवस्था क्यों नहीं करती जबकि लोग इतना पैसा खर्च करके भी इतनी परेशानी उठाते हैं। मैं कांग्रेस से खफा तो रहा लेकिन मेडिकल शिक्षा को लेकर कभी ज्यादा दोष नहीं दिया। मुझे लगता था कि हो सकता है नये मेडिकल कॉलेज खोलना, या प्राइवेट कॉलेज की फीस कम करना सरकार के संसाधनों से सम्भव नहीं है। अमीर लोग मेडिकल कॉलेज खोलते हैं तो वो फीस भी ज्यादा लेते हैं अपने घर से तो खर्च उठाएंगे नहीं। समय गुजरा मोदी जी भी सत्ता में आ गए। मेरा मेडिकल शिक्षा से सीधा कोई लेना देना न था तो क्या बदलाव हो रहे हैं इसपर ज्यादा ध्यान भी नहीं दिया  जब तक कि न्यूज़ पेपर में एक खबर नहीं पढी कि UP में योगी सरकार हर जिले में एक मेडिकल कॉलेज खोलने जा रही है। अब एक बार फिर हैरान होने का समय था कि जब एक बीमारु राज्य माने जाने वाले प्रदेश की सरकार इतनी बड़ी संख्या ( UP में शायद 80 के आस पास जिले है ) में मेडिकल कॉलेज खोल सकती है तो अब तक क्या होता रहा? जिस AIIMS दिल्ली को लेकर कांग्रेस नेहरू के गुण गान करती है वो भी राजकुमारी अमृत कौर ने अपने निजी प्रयास से शुरू किया था। दिल्ली का एक और बड़ा अस्पताल लेडी हार्डिंग अंग्रेजों के जमाने का है। जब सरकारी मेडिकल कॉलेज बड़ी संख्या में खोले जा सकते थे तो कांग्रेसियों ने इतने दिन मारा मारी क्यों मचवाई, एक समय था ज़ब केंद्रीय मंत्री भी AIIMS में बेड नहीं दिलवा पाते थे और आज देश में अनेकों AIIMS हैं नेता तो खैर अब मेदांता गुरुग्राम भागने लगे हैं।

जो काम एक भगवाधारी महंत ने UP में आसानी से कर दिया उसके बारे में विदेश में पढ़े राजनेताओं वाली कांग्रेस कैसे सोच तक नहीं पाई!

निजी मेडिकल संस्थानों में 50 फीसदी सीटों की फीस सरकारी मेडिकल कॉलेजों के बराबर करने के लिए मोदी सरकार का विशेष धन्यवाद। आशा है भविष्य कांग्रेस शासन जैसे दिन किसी को न देखने पड़ें जो मध्यम वर्ग के मां बाप के लिए मेडिकल फील्ड और अच्छा इलाज लगभग असम्भव बना देती है।

इस विषय से जुड़े और भी कई संस्मरण हैं। लगभग इसी कालखंड (2004-05) में मेरे एक परिचित की बेटी ने निजी कॉलेज में BDS में एडमिशन लिया था जिसकी फीस लगभग 6.5 लाख रूपये मात्र थी और उस समय ये काफी बड़ी रकम थी।

मैं इसे मोदी सरकार का धन्वंतरि अवतार इसलिए कहता हूँ क्योंकि इससे आम इंसान जिसके पास लूट का पैसा नहीं होता बस केवल प्रतिभा और नैतिकता होती हो वो भी इस क्षेत्र में करियर बनाने के बारे में सोचने की हिम्मत जूता पायेगा। और ज़ब अनावश्यक पैसा फूंके बिना बच्चे पढ़ेंगे तो आगे चलकर उनके अंदर भी इलाज के नाम पर लूटने की भावना कम होगी।


https://www.amarujala.com/education/nmc-directs-that-fees-of-50-seats-in-pvt-medical-colleges-should-be-on-par-with-govt-institutes

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