Salami slicing tactics in Karnataka hijab row (Blog in Hindi language)
वैसे तो सलामी स्लाइसिंग का जिक्र आज कल चीन की रणनीति के बारे में किया जाता लेकिन आज हम इस ब्लॉग में समझेंगे कि किस प्रकार मजहबी कट्टरपंथी सनातन संस्कृति धर्म और राष्ट्र को नष्ट करने के लिए चीन के बहुत पहले से कर रहे हैं और स्वघोषित बड़े से बड़ा राष्ट्रवादी व्यक्ति या संगठन न तो इसको स्वयं समझ पाया है न आम जनता को समझा पाया है।
पहले संक्षिप्त में समझते हैं सलामी स्लाइसिंग क्या है और चीन इस रणनीति का प्रयोग किस कार्य के लिए करता है। जब विरोधी द्वारा आप को सीधा नुकसान न पहुंचा कर बहुत छोटे छोटे नुक्सान लगभग न के बराबर लगातार पहुँचाया जाये जिसे या तो आप नोटिस न करें या छोटा समझ इग्नोर कर दे पर यही नुकसान दीर्घकाल में आपके लिए बहुत बड़ा नुकसान साबित हो तब इसे सलामी स्लाईसिंग कहा जा सकता है।
इसे तीन उदाहरण से ज्यादा स्पष्ट समझें। चीन एक बड़ा देश है, दूसरों कि भूमि पर कब्ज़ा करता है, जैसे कई बार किया है भारत में सेना कुछ किलोमीटर आगे तक चक्कर लगाने भेज दी और वापस लौट गए। भारतीय सेना ने देख लिया पर लड़ने की जरूरत सरकार ने नहीं समझी, कुछ साल बाद फिर आये और चट्टानों पर लिख गए, फिर कुछ सालों बाद टेंट छोड़ गए ऐसी घटनाएं इग्नोर की जाती रहीं तो फिर एक दिन वहां कब्ज़ा करके बैठ गए। कुछ किलोमीटर के लिए सरकार ने फिर लड़ना उचित नहीं समझा। कांग्रेस के समय इसी प्रक्रिया को बार बार दोहरा कर चीन ने बिना युद्ध लड़े भी काफी ज़मीन कब्ज़ा ली और देश में कोई हंगामा भी नहीं हुआ.
दूसरा और आसान उदाहरण: आप किसी दुकान पर सामान लेने जाते हैं, दूकानदार एक दो रुपये चेंज न होने की बात बोल टॉफी पकड़ा देता है। हो सकता है कि उसके पास चेंज न हो, ये भी हो सकता है कि उसने जानबूझकर चेंज न देकर ऐसा किया हो. आप इसी उधेड़बुन में उससे बहस नहीं करते क्यूंकि करेंगे तो पब्लिक आपको ही पागल समझेगी। आप के लिए एक या दो रुपये बड़ी रकम नहीं है और टॉफी तो मिल ही रही है पर जरा सोचिये अगर वो दूकानदार दिन भर में हजार लोगों के साथ ऐसा करे तो दिन में कम से कम 100 रूपये, महीने में 3000 रूपये और साल भर में 36000 रूपये तो बचा ही लेगा और लाखों लोग उससे बिना कुछ बोले टॉफी ले चुके होंगे।
तीसरा याद करिये जिओ के आने के पहले कई मोबाईल कंपनी थी जो कभी कॉलर टियून कभी जोक्स जैसी चीजों के लिए एक आध रुपये अकाउंट में से महीने दो चार महीने में उड़ा देती थी. कितने लोग गए कोर्ट केस करने या कंपनी में शिकायत करने? अगर जाते तो 1 रूपये या कुछ पैसे के चक्कर में 100-200 का पेट्रोल और फूंक बैठते। कंपनियों के पास करोड़ों ग्राहक थे अगर साल में कभी न कभी हर के बैलेंस में से 50 पैसे भी गलत काट लिए तो कंपनी को तो करोड़ों का फायदा हुआ और ग्राहकों को पता भी नहीं चला।
भारत में मजहब को आये लगभग 1300 साल हो गए और आज पाकिस्तान हिंदुस्तान बांग्लादेश अफगानिस्तान जो कि उस समय तक धार्मिक थे उनमे से आधे से भी ज्यादा आज ज़मीन या संख्या के मामले में धर्म छोड़ रिलीजन या मजहब मानने वाले है. ये सब अचानक नहीं हुआ बल्कि सलामी स्लाइसिंग द्वारा धीमे धीमे हुआ। इसमें सबसे ज्यादा तेजी तब देखी गई जब भारत की आजादी के आस पास से तेल और मिशन की फंडिंग के लिए कुछ खास लोगों को पैसा मिला।
ये कुछ शतक वर्ष पहले तक हिन्दू शाही राजा के नियंत्रण में रहे अफगानिस्तान था और आज वहां तालिबान है। कुछ दशक पहले तालिबान के आगमन से पहले तक वहां लगभग 3 लाख धार्मिक थे आज एक भी नहीं। अमिताभ बच्चन और श्रीदेवी ने खुदागवाह की शूटिंग वहीं की थी और आज कोई फ़िल्म देखने की कोशिश भी करे तो उसे सजा मिलेगी और जान भी गँवानी पड सकती है.
क्या एक दिन आप अपना दिन इस हाल में देखना पसन्द करोगे? अगर नहीं तो अभी आवाज उठाओ।
चीन से भी सैकड़ों वर्ष पहले से जारी मजहबी salami slicing की रणनीति को पहचानो और पहली हरकत पर ही विरोध करो।
1947 में कश्मीर भी आजादी के समय क्षत्रिय राजा के नियंत्रण में था। आज का पाकिस्तानी पंजाब जो कि पूरे पंजाब का 2/3 है अंग्रेजो के समय भी सिंहों के नियंत्रण में था।
1947 तक ढाका लाहौर करांची कश्मीर के अधिकांश व्यापार पर धार्मिक व्यापारियों का नियंत्रण था। ये सारे स्थान सलामी स्लाइसिंग की मजहबी रणनीति से धर्म विहीन हो गए।
सलामी स्लाईसिंग सिर्फ चीन नहीं करता मजहब और रिलीजन भी करता है। केरल पश्चिम बंगाल आंध्रा भी इसी मुहाने पर है।
सलामी स्लाइसिंग की रणनीति खुद समझिये सीखीये और देश की जनता को भी सिखाइये।
सलामी स्लाइसिंग सिर्फ ज़मीन की नहीं होती बल्कि संस्कृति सभ्यता की भी होती है।
इस पोस्ट को इतना शेयर करें कि देश का हर नागरिक इस सलामी स्लाईसिंग के बारे में जान जाये। सलामी स्लाईसिंग उंगली पकड़ के कलाई पकड़ने का ही प्रोफेशनल वर्जन है।
70 साल पहले ही देश कटटरपंथ ने आधा ले लिया था अब इनको अचानक स्कूल ड्रेस की जगह बुर्के की याद कैसे आने लगी, आज विवाद से बचने को जिद मान ली तो कल को कुछ पुलिस वाले तालिबानी गेटअप की मांग करने लगेंगे। और ये प्रक्रिया जारी रहेगी.
क्या किसी शिव भक्त को क्लास में भंग पीते देखा है? क्या कोई हनुमान भक्त स्कूल ड्रेस पर लंगोट बाँध आता है? क्या कोई आदिवासी केवल पत्ते लपेट क्लास में बैठने की मांग करता है?
हाईकोर्ट इस विषय पर सुनवाई कर गलत कर रहा है ये देश लोकतान्त्रिक तरीके से चलेगा। अगर कोर्ट ऐसी मांगे मानने बैठ गई तो कल को कोई अपराधी यह भी कह सकता है कि मैं किसी काफिर के सामने पेश नहीं होऊंगा ये मेरा फंडामेंटल राईट है मुझे सिर्फ काज़ी जी के सामने पेश किया जाए.
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